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September 22nd, 2021 Blog

संतोषी माता शुक्रवार व्रत

संतोषी माता को हिंदू धर्म में संतोष, सुख, शांति और वैभव की माता के रुप में पूजा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता संतोषी भगवान श्रीगणेश की पुत्री हैं. संतोष हमारे जीवन में बहुत जरूरी है. संतोष ना हो तो इंसान मानसिक और शारीरिक तौर पर बेहद कमजोर हो जाता है. संतोषी मां हमें संतोष दिला हमारे जीवन में खुशियों का प्रवाह करती हैं.माता संतोषी का व्रत पूजन करने से धन, विवाह संतानादि भौतिक सुखों में वृद्धि होती है. यह व्रत शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार से शुरू किया जाता है .

संतोषी माता के व्रत की पूजन विधि

  • सुख-सौभाग्य की कामना से माता संतोषी के 16 शुक्रवार तक व्रत किए जाने का विधान है.
  • सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफ़ाई इत्यादि पूर्ण कर लें.
  • स्नानादि के पश्चात घर में किसी सुन्दर व पवित्र जगह पर माता संतोषी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें.
  • माता संतोषी के संमुख एक कलश जल भर कर रखें. कलश के ऊपर  एक कटोरा भर कर गुड़ व चना रखें.
  • माता के समक्ष एक घी का दीपक जलाएं.
  • माता को अक्षत, फ़ूल, सुगन्धित गंध, नारियल, लाल वस्त्र या चुनरी अर्पित करें.
  • माता संतोषी को गुड़ व चने का भोग लगाएँ.
  • संतोषी माता की जय बोलकर माता की कथा आरम्भ करें.

इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ में गुड़ और भुने हुए चने रखे. सुनने वाला प्रगट ‘संतोषी माता की जय’ इस प्रकार जय जयकार मुख से बोलता जावे. कथा समाप्त होने पर हाथ का गुड और चना गाय को खिला देवें. कलश के ऊपर रखा गुड और चना सभी को प्रसाद के रूप में बांट देवें. कथा से पहले कलश को जल से भरे और उसके ऊपर गुड व चने से भरा कटोरा रखे. कथा समाप्त होने और आरती होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगहों पर छिड़कें और बचा हुवा जल तुलसी की क्यारी में सींच देवें. बाज़ार से गुड मोल लेकर और यदि गुड घर में हो तो वही काम में लेकर व्रत करे. व्रत करने वाले को श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न मन से व्रत करना चाहिए.

शुक्रवार व्रत कथा

Santoshi mata blog

एक समय की बात है एक नगर में एक बुढ़िया और उसका बेटा रहा करता था। कुछ समय बाद उस बुढिया ने अपने बेटे का विवाह कर दिया । विवाह के बाद वह अपनी बहू से सारे काम करवाने लगी। बहू को किसी न किसी बात से परेशान करने लगी। बहू घर का सारा काम करती थी और बुढिया उसे ठीक से खाना भी नहीं देती थी। यह सब उसका बेटा चुपचाप देखता था और इन सब से परेशान होकर उसने शहर जाने का फैसला किया । उसने अपनी मां और बीबी को शहर जान के बात बता दी । बुढिया के बेटे ने अपनी पत्नी से कुछ निशानी देने के लिए कहा । तो वह रोने लगी कि मेरे पास तो तुम्हे देने के लिए कुछ नहीं है और उसके चरणों में गिर गई । इसके बाद वह शहर चला गया । एक दिन बुढि़या की बहू घर के काम से बाहर गई । वहां उसने देखा कि बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता की पूजा कर रही है। उसने उन स्त्रियों से व्रत की विधि जानी । तब उन स्त्रियों ने उसे कहा कि एक लौटे में जल और गुड़ और चने का प्रसाद लेकर मां कि पूजा करे और इस दिन खटाई बिल्कुल भी न खाए । उसने ऐसा ही किया मां की कृपा से उसके पति की चिट्ठी और पैसे आने लगे। उसने मां से कहा कि हे मां जब मेरे पति आ जाएंगे तो मैं उद्यापन करूंगी। संतोषी माता की कृपा से उसका पति भी आ गया । इसके बाद उसने व्रत का उद्यापन किया। लेकिन उसकी पड़ोस में रहने वाली एक स्त्री उससे बहुत अधिक चिड़ती थी । उसने अपने बच्चों को खटाई खाने के लिए सीखा दिया । इसके बाद बच्चों ने ऐसा ही किया । इससे मां क्रोधित हो गई और उसके बाद उसके पति को राजा के सिपाही पकड़कर ले गए । इसके बाद बुढ़िया की बहू ने मां से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी और फिर से उद्यापन किया । जिसके बाद उसकी सभी परेशानियां समाप्त हो गई और उसे पुत्र की प्राप्ति हुई।

शुक्रवार का व्रत- महत्व

शुक्रवार का व्रत विभिन्न कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है। शुक्रवार के उपवास के स्पष्ट कारणों में से एक है क्योंकि संतोषी माता का जन्म शुक्रवार को हुआ था। कुछ लोग संतोषी माता को शक्ति या शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजते हैं जो उनके सभी दुख और चिंताओं को दूर कर सकती हैं। इसी तरह, अन्य लोग अपने जीवन से बाधाओं को दूर करने, अपने बच्चों को स्वस्थ रखने और एक खुशहाल पारिवारिक जीवन जीने के लिए शुक्रवार को उपवास करते हैं। वजह चाहे जो भी हो शुक्रवार का व्रत निश्चय ही हर तरह से फलदायी होता है। शुक्रवार को उपवास करने और इसी दिन संतोषी मां की पूजा करने की अवधारणा के पीछे एक सच्ची कहानी है। किंवदंतियों के अनुसार, भगवान गणेश के पुत्र, शुभ और लभ, रक्षा बंधन के रिवाज के महत्व को समझना चाहते थे और वे एक छोटी बहन की इच्छा रखते थे। इस प्रकार, भगवान गणेश ने संतोषी माता  को बनाया। क्योंकि उसने अपने बड़े भाइयों की इच्छाओं और इच्छाओं को पूरा किया, इसलिए उसका नाम संतोषी रखा गया।

कैसे करें उद्यापन 

पूजा के अंतिम दिन, यानी, संतोषी माता व्रत उद्यापन के दिन, संतोषी माता की तस्वीर के सामने घी का दीया जलाएं और “संतोषी माता की जय” बोलते रहें तथा नारियल फोड़ें। इस विशेष दिन पर घर में कोई भी खट्टी वस्तु नहीं रखनी चाहिए और न ही कोई खट्टी वस्तु खाएं और न ही दूसरों को परोसें। उद्यापन के लिए संतोषी माता के अनुष्ठानों के अंतिम दिन में आठ लड़कों को त्योहार का भोजन परोसा जाता है। व्रत रखने वाले व्यक्ति को कथा सुनने के बाद और केवल एक समय भोजन करना चाहिए। इस तरह, देवी संतोषी माता खुश हो जाती हैं और गरीबी और दुःख को दूर करती हैं

इस प्रकार नियम पूर्वक माता संतोषी का 16 शुक्रवार व्रत एवं पूजन करना विशेष फलदायी होता है, जो सभी कष्टों से मुक्त करके घर में सुख शांति लाता है। 

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